US vs China: इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बैटरी पर कब्जे की लड़ाई, इस कारण नए दौर का गोल्ड है इसका कचरा

US vs China: ईवी में इस्तेमाल होने वाली बैटरी की लाईफ 10 साल या इससे अधिक होती है। आने वाला जमाना ईवी का है और अभी जो ईवी इस्तेमाल हो रही हैं, उसकी बैटरी की लाईफ खत्म होने पर उसे रिसाईकिल किया जाता है। अभी इसे रिसाईकिल करने के मामले में चीन किंग है लेकिन अमेरिका इसे कड़ी टक्कर दे सकता है

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US VS CHINA: ईवी रिसाइकलिंग को लेकर अमेरिका में कंपनियों को सपोर्ट मिल सकता है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यील्ड को लेकर है। अभी इस मामले में चीन किंग है।
china ने इलेक्ट्रिक कारों (Electric Vehicle) की तकनीक पर ना सिर्फ महारत हासिल कर ली है, बल्कि बैटरी के बाज़ार पर भी एकछत्र राज्य है उसका। इसको ऐसे समझिए कि जिस तरह से पेट्रोल और डीजल कारें बनाने में यूरोप, जापान और यूएस का दबदबा था और तेल के लिए दुनिया निर्भर थी खाड़ी देशों पर, कुछ वैसा ही इलेक्ट्रिक कारों के मामले में है चीन के साथ।

लेकिन, यहां तकनीक के साथ-साथ बैटरी बनाने में इस्तेमाल होने वाली धातु लिथियम (Lithium) पर भी उसका ही क़ब्ज़ा है। कोई भी देश सभी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक बनाता है, तो कहीं ना कहीं चीन पर निर्भरता बढ़ेगी। बीजिंग के साथ जियो पॉलिटिकल मसलों को देखते हुए भारत ऐसा कभी नहीं चाहेगा।

हिंदुस्तान यहां एक अलग रास्ता अपनाकर बढ़त ले सकता है। US vs China एक बहुत बड़ा बाज़ार है भारत के पास, इसलिए वह इसमें लीड कर सकता है। चीन के इलेक्ट्रिक कार मार्केट (China’s electronic car market) के जवाब के तौर पर भारत हाइब्रिड कारों का मार्केट तैयार कर सकता है। अगर वह सस्ती हाइब्रिड तकनीक डिवेलप करे, तो ना सिर्फ उसके लिए ख़ुद अपने यहां बड़ा लोकल बाज़ार रहेगा बल्कि एक्सपोर्ट भी कर सकता है। हाल ही में आई कई रिपोर्ट्स की मानें तो अभी क्रूड आयल ख़त्म होने वाला नहीं। भारत में लिथियम के भंडार भी मिल रहे हैं। ऐसे में दोनों का एक बेहतरीन कॉम्बिनेशन अपनाकर इस फील्ड में भारत तेज़ी से आगे बढ़ सकता है।

Us vs china ने इलेक्ट्रिक कारों (Electric Vehicle) की तकनीक पर ना सिर्फ महारत हासिल कर ली है, बल्कि बैटरी के बाज़ार पर भी एकछत्र राज्य है उसका। इसको ऐसे समझिए कि जिस तरह से पेट्रोल और डीजल कारें बनाने में यूरोप, जापान और यूएस का दबदबा था और तेल के लिए दुनिया निर्भर थी खाड़ी देशों पर, कुछ वैसा ही इलेक्ट्रिक कारों के मामले में है चीन के साथ।

हाइब्रिड तकनीक कोई नई नहीं है। भारत में इलेक्ट्रिक कारों के आने से पहले ही टोयोटा कैमरी के रूप में एक हाइब्रिड कार ला चुकी थी। हाइब्रिड मतलब ऐसी कार, जिसमें पेट्रोल इंजन और इलेक्ट्रिक मोटर, दोनों लगी हैं। इंजन को पावर देने के लिए पेट्रोल और मोटर को चलाने के लिए बैटरी रहती है। हाइब्रिड तकनीक में भी दो तरह की तकनीकों का ही ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

पहली तकनीक है प्लग इन हाइब्रिड,

इसमें एक बड़ा बैटरी पैक लगा होता है, जो गाड़ी को 50 से 100 किमी तक सिर्फ इलेक्ट्रिक मोड पर ही चला सकता है। इसके बाद इसे पेट्रोल मोड पर शिफ्ट किया जा सकता है यानी जिन्हें रोज सौ किलोमीटर तक चलना होता है, वे पूरी तरह इलेक्ट्रिक मोड पर चल सकते हैं। शहर में आपकी गाड़ी कोई पलूशन नहीं करेगी। लॉन्ग ड्राइव पर निकलने में भी दिक्कत नहीं, क्योंकि पेट्रोल मोड होगा।

लेकिन, इसकी बैटरी को हर बार किसी चार्जिंग पॉइंट पर लगाकर ही चार्ज करना होता है। इसके अलावा इस तकनीक वाली कारें काफी महंगी होती हैं। कुछ वक़्त पहले तक वॉल्वो इस तकनीक की एसयूवी को करीब 90 लाख रुपये की क़ीमत में बेचती थी। ऐसे में इसे आम लोगों की पहुंच में लाने के लिए बहुत काम करना होगा। अगर इस तरह की कारें 15 से 25 लाख रुपये में मिलने लगें, तो गेम चेंजर साबित हो सकती हैं क्योंकि इस सेगमेंट की गाड़ियों की इस समय सबसे ज़्यादा मांग है। इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इनके लिए 6 महीने से लेकर डेढ़ साल तक की वेटिंग चल रही है।

दूसरी तकनीक है सेल्फ चार्जिंग हाइब्रिड,

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US VS CHINA: ईवी रिसाइकलिंग को लेकर अमेरिका में कंपनियों को सपोर्ट मिल सकता है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यील्ड को लेकर है। अभी इस मामले में चीन किंग है।

होंडा ने सबसे पहले इस तकनीक से लैस अपनी सिडैन कार सिटी को मार्केट में उतारा था। टोयोटा की हाईराइडर और मारुति सुजुकी की ग्रैंड विटारा भी इस तकनीक के साथ मार्केट में मौजूद हैं। हर महीने 10-12 हज़ार गाड़ियां सेल्फ चार्जिंग हाइब्रिड वाली बिक रही हैं। इसमें एक काफी छोटा बैटरी पैक लगा होता है, जो मोटर को पावर देता है। इसमें बैटरी को अलग से चार्ज नहीं करना होता। इंजन जेनरेटर की तरह काम करता है और लगातार बैटरी को चार्ज करता रहता है। इसका सिस्टम ख़ुद ही कार को कभी इलेक्ट्रिक तो कभी पेट्रोल मोड पर शिफ्ट करता रहता है। आम कारों के मुक़ाबले ये करीब 40 पर्सेंट तक ज़्यादा माइलेज देती हैं। कंपनियों का दावा है कि सिटी ट्रैफिक में करीब 60 फ़ीसदी वक़्त ये इलेक्ट्रिक मोड पर ही चलती हैं। इस तकनीक वाली कारों की क़ीमत 16-17 लाख रुपये से शुरू होती है। इस तकनीक वाली कारों को भी 8 से 10 लाख रुपये की रेंज में लाना होगा।

US vs China Electric Cars: इंजन को कार की आत्मा कहा जाता है. यह इसलिए क्योंकि बिना इंजन के कार चल ही नहीं सकती. इसी तरह इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी कार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होती है. बैटरी के बिना इलेक्ट्रिक कार को चलाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. लेकिन क्या आपने सोचा है कि क्या हो अगर एक चलती हुई इलेक्ट्रिक कार से उसकी बैटरी ही बाहर निकल जाए?

जी हां, कुछ ऐसा ही हुआ चीन के सिचुआन प्रांत के एक मुख्य सड़क पर, जहां एक चलती इलेक्ट्रिक कार से बैटरी बाहर निकल गई. कार न्यूज चाइना के अनुसार, यह कार काओ काओ 60 (Cao Cao 60) है जिसे इसी साल मार्च में चीन में 119,800 युआन (17,500 डॉलर) में लॉन्च किया गया था. कंपनी इस कार में स्वैप होने वाली बैटरी देती है और इसे केवल एक मिनट के भीतर बदलने का दावा भी करती है. इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है, जिसे शेयर करके लोग कार की क्वालिटी पर सवाल उठा रहे हैं.

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